हाथ मिला कोशिश कर भाई ऐसा भी हो सकता है।
अपना आंगन मंदिर मस्जिद गिरजा भी हो सकता है।
तुमसे मतलब नहीं है कोई लेकिन तुम भी दुआ करो,
अरसे से बीमार पड़ोसी अच्छा भी हो सकता है।
सच कहता हूं नफरत की यह आग भरोसमंद नहीं,
कल इसका आहार तुम्हारा बच्चा भी हो सकता है।
कुछ चित्रों को गैर समझकर कोई पुस्तक मत फाड़ो,
पलट के पढ़ लो उसमें अपना मुखड़ा भी हो सकता है।
मत इतनी उम्मीद करो कि जार - जार रोना होवे,
खून से सींचा आम फला तो खट्टा भी हो सकता है।
आंगन की दीवार उचककर कभी उधर भी झांको तो,
बिछड़ा भाई फिर मिलने को प्यासा भी हो सकता है।
हर मौसम को खौफ समझकर दरवाजा मत बंद करो,
आने वाला खुशियों का शहजादा भी हो सकता है।
बहुत बुरा है लोकतंत्र पर इतनी अच्छाई तो मानो,
इस रस्ते पर चलकर प्यादा राजा भी हो सकता है।
इस माटी के धोंधे को भी एक बार अवसर तो दो,
गुल्ली डंडा खेलने वाला गामा भी हो सकता है।
- धीरु
Sunday, November 8, 2009
दुआ करो
Posted by
धीरेंद्र श्रीवास्तव
at
10:56 PM
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

1 comments:
बहुत खूब हुजुर
Post a Comment