1
कवि सम्मेलन में
मंच पर
चढऩे से पहले ही
बोला एक सिपाही
कवि भाई
सही सलामत
घर वापस जाना है
तो थानेदार के खिलाफ
कविता नहीं सुनाना है
मैंने कहा, यार
मैं उस जनपद का
नागरिक हूं
जहां का जिलाधिकारी
मोहर्रम पर
बधाई देता है
आशा है
होली पर
शोक प्रकट करेगा
जहां इतने विषय हैं
वहां थानेदार के खिलाफ
कविताएं कौन पढ़ेगा
मैंने कहा, यार
मैं उस कमिश्नरी में
पत्रकार हूं
जहां का कमिश्नर
एक दिन में
एक करोड़
पौधे लगाता है
आशा है
सौ दिन में
सौ करोड़
पौधे लगाएगा
जहां इतने विषय हैं
वहां थानेदार के खिलाफ
कविताएं कौन सुनाएगा
मैंने कहा, यार
उस सूबे में
विधानसभा की
रिपोर्टिंग कर चुका हूं
जहां की विधानसभा में
विधायक
एक दूसरे पर
राड चलाता है
आशा है
सांसद होने पर
लोकसभा में
कट्टा चलाएगा
जहां इतने विषय हैं
वहां थानेदार के खिलाफ
कवितांए कौन सुनाएगा
मैंने कहा, यार
उस सूबे का पड़ोसी हूं
जहां का
मुख्यमंत्री
भैंस का चारा
पचा चुका है
आशा है
भावी मुख्यमंत्री
सुअर का चारा
पचाएगा
जहां इतने विषय हैं
वहां थानेदार के खिलाफ
कविताएं कौन सुनाएगा
मैंने कहा, यार
उस देश के लोकतंत्र का
प्रमुख स्तंभ हूं
जहां की लोकसभा में
फूलनदेवी
लोकतंत्र की परिभाषा
बतला चुकी हैं
आशा है
माफिया डान दाउद
देशप्रेम की
परिभाषा बतलाएगा
जहां इतने विषय हैं
वहां थानेदार के खिलाफ
कविताएं कौन सुनाएगा
मैंने कहा, यार
मैं उस देश का
वोटर हूं
जहां का प्रधानमंत्री
15 अगस्त को
गणतंत्र दिवस
बतला चुका है
आशा है
आने वाला प्रधानमंत्री
गणतंत्र दिवस को
परतंत्र दिवस बतलाएगा
जहां इतने विषय हैं
वहां थानेदार के खिलाफ
कवितांए कौन सुनाएगा
और सुनो
थानेदार के खिलाफ
कविता पढऩे का फल
मैं पहले ही भोग चुका है
इसलिए थानेदार को
डाकू नहीं कहूंगा
क्योंकि थानेदार तो
सारे आरोप
हंसकर टाल जाता है
और डाकू
गंदे आदमी से
तुलना करने पर
बुरा मान जाता है
और डाकू
बुरा मान गया तो
मैं जंगल में रहूंगा
पत्नी अदालत में
भटकेगी
मुझे छुड़ाने के लिए
न जाने
किन-किन बांहों की
सूली पर लटकेगी
संभव है
सबके बाद भी
पछताना पड़े
मेरी रिहाई के लिए
उसी डाकू के पास
जाना पड़े
सिपाही बोला
बकवास बंद करो
थानेदार कोई
महात्मा गांधी नहीं होता
जिस हर ऐरा-गैरा
नत्थू- खैरा
शैतान की औलाद कहे
और इस देश में
जिंदा रहे
थानेदार
थानेदार होता है
अपने कर्तव्य केप्रति
कितना वफादार होता है
नहीं जानते हो
इंदिरा गांधी की
हत्या की कहानी
पढ़ लो
इसलिए मेरी मानो तो
इस बार
थानेदार के
पक्ष में
कविता सुनाओ
भुगतान दूना लेकर जाओ
मैंने कहा
ठीक है यार
सोचूगा
कहकर आगे बढ़ा
कि किसी आप जैसे
आदमी का
घूंसा मेरे सीने पर पड़ा
बोला
क्या सोच रहे हो
चंद सिक्कों के लिए
चित्रगुप्त की कलम
बेच रहे हो
मैंने कहा, यार
तुम्हारा यह घूंसा
और घूंसा भरा प्यार
अच्छा लगा
लेकिन
एक बात
मेरी भी मानो
हिम्मत हो तो
उस व्यवस्था के खिलाफ
मुट्ठियां तानों
जो भाई को भाई से
दूर करती है
एक सिपाही को
कविता पढऩे से
रोकन के लिए
मजबूर करती है।
2
उलझी हुई दाढ़ी
बिखरा हुआ बाल
आज हो गया
जी का जंजाल
स्टेशन से उतरते ही
मुझको
एक सिपाही ने
पकड़ लिया
बोला
मेरी नजर से
बचकर
कोई नहीं
जा सकता है
सौदा यहीं कर लो
नहीं तो थाने में
महंगा पड़ सकता है
मैंने सिपाही को
अपना परिचय बतलाया
समझाया
कि दाढ़ी और बाल पर
मत जाओ
मैं वो नहीं हूं
जो तुम
समझ रहे हो
सिपाही बोला
तुम पुलिस से
उलझ रहे हो
थाने चलो
जब चूतर के नीचे
दारोगा की रुल लोगे
संसद पर हमले में भी
शामिल होना भी
कबूल लोगे
सिपाही और मेरे बीच
चल रही बहस सुन
एक नेता जी आ गए
मेरी तरफ से
सिपाही से
टकरा गए
मैंने सोचा विपदा टली
लेकिन
मेरा सपना
बहुत जल्द टूटा
मैं दस रुपए की जगह
सौ रुपए देकर छूटा
मैं हिम्मत नहीं हारा
नेता और सिपाही
दोनों को ललकारा
मैं कवि हूं
कवि सम्मेलन में
जा रहा हूं
वहां उल्टी सीधी सुनाउंगा
तुम्हारी नौकरी
तुम्हारी नेतागिरी
खा जाउंगा
सिपाही हंसा
मूर्ख
तूं कहां आ फंसा
तूं जहां जा रहा है
वहां जमीन पर बैठा
हिंदुस्तान मिलेगा
मंच पर जिलाधिकारी
और कप्तान मिलेगा
फैसला अभी से जान ले
भजन लाल की
संस्कृति पहचान लें
सौ की जगह
हजार देना
तब हमारा नाम लेना
और सुनो
इसके ऊपर
जाने पर
आदमी बस रोता है
वहां सौदा
कम से कम
लाख में होता है
यही नहीं
उनपर
उंगुली उठाने वाले को
बेमौत
मरना होता है
कवियों को भी
फांसी पर
चढऩा होता है
सिपाही की बात सुन
मेरे होठ सूख गए
बहुत मुश्किल से
अब आपके समक्ष
बोल रहा हूं
कि सवाल केवल
सौ रुपए का नहीं
सवाल
संपूर्ण व्यवस्था का है
जिसके दागदार होने से
यह देश
दागदार हो जाता है
एक कवि
पाकिटमार हो जाता है।
-धीरु
Sunday, October 25, 2009
सिपाही से भेंट
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धीरेंद्र श्रीवास्तव
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8:03 PM
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Thursday, October 22, 2009
चरित्रहीन ओलम्पिक
आवश्यकता है
कुछ चरित्रहीनों की
जो चरित्रहीन ओलम्पिक में
भारत को
गोल्ड मेडल
दिलवा सकें
देश का गौरव
बढ़ा सकें
का अखबारों में
विज्ञापन
पढ़कर
मैंने
गांव के
प्रधान से कहा
आप अगर
किस्मत आजमाएंगे
गोल्ड मेडल
जरूर पाएंगे
प्रधान जी रोने लगे
बोले
हम इस मामले में भी
बड़े अभागे हैं
विधायक जी
हमसे सौ कदम
आगे हैं
और सांसद का
क्या पूछना है
वो तो वैसे ही
विधायक का
पांच गुना है
मंत्री
कुछ और
ज्यादा होगा
उसके ऊपर
बोफोर्स का
दादा होगा
मगर
ये तमाम लोग
मिलकर भी
चरित्रहीन ओलम्पिक में
जाएंगे
तो गोल्ड मेडल
नहीं पाएंगे
क्योंकि
ओलम्पिक
कोई दंगा नहीं है
कि जब चाहा
करा दिया
ओलम्पिक खेल है
और खेल के लिए
कड़ी मेहनत
जरूरी है
मैं जानता हूं
इस देश में
कड़ी मेहनत
केवल अधिकारी
कर सकता है
ये अधिकारी
अगर चरित्रहीन
ओलम्पिक में जाएंगे
गोल्ड मेडल
जरूर पाएंगे
लेकिन
एक शर्त है
चरित्रहीन ओलम्पिक में
कोई व्यापारी
नहीं शामिल हो
नहीं तो
इन अधिकारियों का
ईमान डिग जाएगा
गोल्ड मेडल
चंद डालरों में
बिक जाएगा
प्रधान जी रोने लगे
बोले
कवि जी
इस मामले में भी
हम लोगों को
केवल पछताना है
गोल्ड मेडल
नहीं पाना है
मैंने कहा
पा सकते हो
और पाना है तो
चरित्रहीन ओलम्पिक में
चरित्रवान भेजो
बंटवारे से पहले का
हिन्दुस्तान भेजो
मेरा दावा है
तू फिर
दुनिया में
छा जाएगा
गोल्ड मेडल
पा जाएगा।
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धीरेंद्र श्रीवास्तव
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7:27 PM
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Sunday, October 18, 2009
एक दीप अपना भी
खुशियों की वर्षा हो,
दामन में आपके।
एक दीप अपना भी,
आंगन में आपके।
भादों मनभावन हो।
जेठ भी लुभावन हो।
फांगुन सी खुशियां हों,
सावन में आपके।
एक दीप अपना भी,
आंगन में आपके।
अमृत की हाला हो,
मोती की माला हो,
हीरे जड़े जाएं,
छाजन में आपके।
एक दीप अपना भी,
आंगन में आपके।
नयनन में नेह रहे।
मुझ पर भी स्नेह रहे।
समृद्धि वास करे,
कानन में आपके।
एक दीप अपना भी,
आंगन में आपके।
-धीरु
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धीरेंद्र श्रीवास्तव
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7:40 PM
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Thursday, October 15, 2009
मुठभेड़
मेरे गांव में
सड़क है
स्कूल है
अस्पताल है
पंचायत भवन
कई किता है
पर सब कुछ
कागज में छिपा है
इसे देखने को
आवश्यक है
आदमी
पढ़ा लिखा हो
उसका जमीर
बिका हो
मेरे गांव का
लेखपाल हो या
बीडीओ
एसडीएम हो
या डीएम
सभी इस निर्माण को
देख चुके हैं
इसकी अच्छाइयों
की रिपोर्ट
शासन को
भेज चुके हैं
इन रिपोर्टों के
आधार पर
मेरे गांव का
प्रधान
राज्य सरकार से
पुरस्कार पा चुका है
राष्ट़पति पदक के लिए
उसका नाम
दिल्ली जा चुका है
मेरे गांव का प्रधान
आश्वस्त है
कि उसका
कागजी फूल
दिल्ली में भी
खिलेगा
यह पुरस्कार
उसे ही मिलेगा
इस बीच
मेरे गांव में
एक ऐसा
पंचायतकर्मी आ गया
जो फाइल के
निर्माणों को़
जमीन पर ढूढ़ने लगा
प्रधान की धोखाधड़ी पर
कूढ़ने लगा
बात
लेखपाल से होते हुए
एसडीएम तक गयी
उन्होंने
पंचायतकर्मी को
बुलाया
और कहा
प्रधान से
मिलजुलकर रहो
फाइल में हुए
निर्माणों को
सही कहो
पंचायतकर्मी
हांफते हुए
फाइलों में हुए
निर्माण की कथा
डीएम को सुनाया
एसडीएम के
कथन को दोहराया
और शासन का
असली चेहरा
चरितार्थ हो गया
डीएम की कलम से
पंचायतकर्मी
बर्खास्त हो गया
लेकिन हिम्मत नहीं हारा
उसने फाइल में हुए
निर्माणों की
कथा
विधायकों को बतलाया
कुछ करने के लिए
उकसाया
सच जानकर
विधानसभा
गरम हो गई
स्थिति संभालने को
मुख्यमंत्री जी आए
पहले मुस्कराए
और फिर
न सांप मरे
न टूटे लाठी
की कहावत को
चरितार्थ कर दिया
मेरे गांव से
पंचायतकर्मी का
पद ही
समाप्त कर दिया
पंचायतकर्मी
फिर भी
हिम्मत नहीं हारा
इस मामले में
कुछ करने के लिए
दिल्ली में बैठी
सरकार को ललकारा
जवाब मिला
पाकिस्तान को
आतंकियों के खिलाफ
कार्रवाई करनी होगी
पंचायतकर्मी ने कहा
सर
बिना बात सुने
आया दूसरा उत्तर
अरुणाचल
भारत का
अभिन्न अंग है
पंचायतकर्मी
चीख पड़ा
सर, हमारी समस्या
पाक और चीन नहीं
फिलहाल
आपके वे लोग हैं
जो फाइलों में
निर्माण का अलख
जगा रहे हैं
जो मेरी रोटी के साथ
इस देश को
खा रहे हैं
जवाब में
इस बार
केवल फायरिंग की
आवाज सुनी गई
और सुबह
अखबारों में
खबर छपी
आंतरिक सुरक्षा
भेद रहा
एक आतंकी
बीती रात
समर्पण के लिए
ललकारा गया
जवाबी मुठभेड़ में
मारा गया।
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धीरेंद्र श्रीवास्तव
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1:08 PM
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Wednesday, October 14, 2009
गांधी के बहाने
एक दिन स्वर्ग में
गांधी की रावण से
भेंट हो गई
रावण ने कहा
हे बाबा
अगर तू त्रेता में आता
उसी समय
लोकतंत्र लाता
तो वोट जुटाने में
राम की बुद्धि
खप्त हो जाती
उसकी जमानत
जब्त हो जाती
क्योंकि
बानरों का वोट
बेकार होता
स्वर्ग तक
सोने की सीढ़ी
बनवाने का
फिर मेरा सपना
साकार होता
और बदले में
तुमको
राष्ट्रपिता क्या
विश्वपिता बनाया होता
हे बाबा
तू त्रेता में आया होता।
पाया महात्मा गांधी का पत्र
पूछते हैं
मेरे बेटे कैसे हैं
सब मेरी तरह हैं
या कुछ
गोड्से जैसे हैं
संसद ने दिया जवाब
महात्मा जी
आप होते तो हो जाते
लाजवाब
आंकड़ों में यह देश
विकास कर रहा है
और आम आदमी
आज भी
आप की तरह
उपवास कर रहा है
और आधुनिक महिलाएं
एक मामले में
पूरी तरह से
आपके रास्ते पर
चल रही हैं
कम से कम
कपड़े पहन रही हैं
महात्मा जी
इधर कुछ
परिवर्तन के
फूल भी खिले हैं
थानेदार कवि सम्मेलनों में
और सांसद
कोठों पर मिले हैं
महात्मा जी
बुरा मत मानियेगा
आजकल
आपके यहां से
हमारे उत्तर
मीडिया में
लीक हो जा रहे हैं
इस वजह से
गड़े मुर्दे
जिंदा हो जाते हैं
और हम
दुनिया के समक्ष
शर्मिंदा हो जाते हैं
महात्मा जी
इसे रोकिए
नहीं तो हमलोगों को
प्रेस कान्फ्रेंस में
जूते की जगह
बुलेट खाना होगा
संसद छोड़कर
आपके पास आना होगा।
Posted by
धीरेंद्र श्रीवास्तव
at
1:23 PM
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