एक खत
एक प्रणाम
कबूतर उड़ाने वाले
लाल देश के नाम
कि तुम्हारे कबूतर
अच्छे लगे
खूबसूरत लगे
सच्चे लगे
उसी प्रकार से
जैसे गांव की
बड़ी हवेली से
होने वाला
गीता का पाठ
रामायण और भजन
अच्छा लगता है
लेकिन
रात के अंधेरे में
जब बड़ी हवेली के भीतर
कोई राक्षस
गौरैया खाता है
हमारा मन
सिहर जाता है
सोचता है
कल मरने वाली
गौरैया
हमारे घर की
लाज है
लेकिन
बड़ी हवेली के लिए
एक सामान्य बात है
रामायण और भजन भी
गौरैया का भोजन भी
लेकिन साथी
आप तो
गौरैया के साथी हो
सुबह के दीप की
लाल बाती है
आप कबूतर की जगह
बाज उड़ाते
आपके बाज
हमारे घर आते
हमको समझाते
और किसी दिन
एहसास
कराने के लिए ही
बड़ी हवेली की
एकाध गौरैया खा जाते
लेकिन साथी
मैं जानता हूं
होना और सोचना
दोनों दो दिशाएं हैं
मैं जानता हूं
नदी के किनारे
केवल थपेड़े खाए हैं
फिर भी घबराते नहीं हैं
सोचते हैं
समझते हैं
धीरे- धीरे
दूसरों को भी
समझाते हैं
कि किसी दिन
हम एक साथ
मुठि्ठयां बांधेंगे
फिर बड़ी हवेली में
नाचेंगे, गाएंगे
और अपनी तरह
पीडि़त लोगों के नाम
कबूतर की जगह
बाज उड़ाएंगे
कबूतर की जगह
बाज उड़ाएंगे।
Saturday, May 22, 2010
संकल्प
Posted by
धीरेंद्र श्रीवास्तव
at
3:33 PM
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