Sunday, October 25, 2009

सिपाही से भेंट

1
कवि सम्मेलन में
मंच पर
चढऩे से पहले ही
बोला एक सिपाही
कवि भाई
सही सलामत
घर वापस जाना है
तो थानेदार के खिलाफ
कविता नहीं सुनाना है
मैंने कहा, यार
मैं उस जनपद का
नागरिक हूं
जहां का जिलाधिकारी
मोहर्रम पर
बधाई देता है
आशा है
होली पर
शोक प्रकट करेगा
जहां इतने विषय हैं
वहां थानेदार के खिलाफ
कविताएं कौन पढ़ेगा
मैंने कहा, यार
मैं उस कमिश्नरी में
पत्रकार हूं
जहां का कमिश्नर
एक दिन में
एक करोड़
पौधे लगाता है
आशा है
सौ दिन में
सौ करोड़
पौधे लगाएगा
जहां इतने विषय हैं
वहां थानेदार के खिलाफ
कविताएं कौन सुनाएगा
मैंने कहा, यार
उस सूबे में
विधानसभा की
रिपोर्टिंग कर चुका हूं
जहां की विधानसभा में
विधायक
एक दूसरे पर
राड चलाता है
आशा है
सांसद होने पर
लोकसभा में
कट्टा चलाएगा
जहां इतने विषय हैं
वहां थानेदार के खिलाफ
कवितांए कौन सुनाएगा
मैंने कहा, यार
उस सूबे का पड़ोसी हूं
जहां का
मुख्यमंत्री
भैंस का चारा
पचा चुका है
आशा है
भावी मुख्यमंत्री
सुअर का चारा
पचाएगा
जहां इतने विषय हैं
वहां थानेदार के खिलाफ
कविताएं कौन सुनाएगा
मैंने कहा, यार
उस देश के लोकतंत्र का
प्रमुख स्तंभ हूं
जहां की लोकसभा में
फूलनदेवी
लोकतंत्र की परिभाषा
बतला चुकी हैं
आशा है
माफिया डान दाउद
देशप्रेम की
परिभाषा बतलाएगा
जहां इतने विषय हैं
वहां थानेदार के खिलाफ
कविताएं कौन सुनाएगा
मैंने कहा, यार
मैं उस देश का
वोटर हूं
जहां का प्रधानमंत्री
15 अगस्त को
गणतंत्र दिवस
बतला चुका है
आशा है
आने वाला प्रधानमंत्री
गणतंत्र दिवस को
परतंत्र दिवस बतलाएगा
जहां इतने विषय हैं
वहां थानेदार के खिलाफ
कवितांए कौन सुनाएगा
और सुनो
थानेदार के खिलाफ
कविता पढऩे का फल
मैं पहले ही भोग चुका है
इसलिए थानेदार को
डाकू नहीं कहूंगा
क्योंकि थानेदार तो
सारे आरोप
हंसकर टाल जाता है
और डाकू
गंदे आदमी से
तुलना करने पर
बुरा मान जाता है
और डाकू
बुरा मान गया तो
मैं जंगल में रहूंगा
पत्नी अदालत में
भटकेगी
मुझे छुड़ाने के लिए
न जाने
किन-किन बांहों की
सूली पर लटकेगी
संभव है
सबके बाद भी
पछताना पड़े
मेरी रिहाई के लिए
उसी डाकू के पास
जाना पड़े
सिपाही बोला
बकवास बंद करो
थानेदार कोई
महात्मा गांधी नहीं होता
जिस हर ऐरा-गैरा
नत्थू- खैरा
शैतान की औलाद कहे
और इस देश में
जिंदा रहे
थानेदार
थानेदार होता है
अपने कर्तव्य केप्रति
कितना वफादार होता है
नहीं जानते हो
इंदिरा गांधी की
हत्या की कहानी
पढ़ लो
इसलिए मेरी मानो तो
इस बार
थानेदार के
पक्ष में
कविता सुनाओ
भुगतान दूना लेकर जाओ
मैंने कहा
ठीक है यार
सोचूगा
कहकर आगे बढ़ा
कि किसी आप जैसे
आदमी का
घूंसा मेरे सीने पर पड़ा
बोला
क्या सोच रहे हो
चंद सिक्कों के लिए
चित्रगुप्त की कलम
बेच रहे हो
मैंने कहा, यार
तुम्हारा यह घूंसा
और घूंसा भरा प्यार
अच्छा लगा
लेकिन
एक बात
मेरी भी मानो
हिम्मत हो तो
उस व्यवस्था के खिलाफ
मुट्ठियां तानों
जो भाई को भाई से
दूर करती है
एक सिपाही को
कविता पढऩे से
रोकन के लिए
मजबूर करती है।

2
उलझी हुई दाढ़ी
बिखरा हुआ बाल
आज हो गया
जी का जंजाल
स्टेशन से उतरते ही
मुझको
एक सिपाही ने
पकड़ लिया
बोला
मेरी नजर से
बचकर
कोई नहीं
जा सकता है
सौदा यहीं कर लो
नहीं तो थाने में
महंगा पड़ सकता है
मैंने सिपाही को
अपना परिचय बतलाया
समझाया
कि दाढ़ी और बाल पर
मत जाओ
मैं वो नहीं हूं
जो तुम
समझ रहे हो
सिपाही बोला
तुम पुलिस से
उलझ रहे हो
थाने चलो
जब चूतर के नीचे
दारोगा की रुल लोगे
संसद पर हमले में भी
शामिल होना भी
कबूल लोगे
सिपाही और मेरे बीच
चल रही बहस सुन
एक नेता जी आ गए
मेरी तरफ से
सिपाही से
टकरा गए
मैंने सोचा विपदा टली
लेकिन
मेरा सपना
बहुत जल्द टूटा
मैं दस रुपए की जगह
सौ रुपए देकर छूटा
मैं हिम्मत नहीं हारा
नेता और सिपाही
दोनों को ललकारा
मैं कवि हूं
कवि सम्मेलन में
जा रहा हूं
वहां उल्टी सीधी सुनाउंगा
तुम्हारी नौकरी
तुम्हारी नेतागिरी
खा जाउंगा
सिपाही हंसा
मूर्ख
तूं कहां आ फंसा
तूं जहां जा रहा है
वहां जमीन पर बैठा
हिंदुस्तान मिलेगा
मंच पर जिलाधिकारी
और कप्तान मिलेगा
फैसला अभी से जान ले
भजन लाल की
संस्कृति पहचान लें
सौ की जगह
हजार देना
तब हमारा नाम लेना
और सुनो
इसके ऊपर
जाने पर
आदमी बस रोता है
वहां सौदा
कम से कम
लाख में होता है
यही नहीं
उनपर
उंगुली उठाने वाले को
बेमौत
मरना होता है
कवियों को भी
फांसी पर
चढऩा होता है
सिपाही की बात सुन
मेरे होठ सूख गए
बहुत मुश्किल से
अब आपके समक्ष
बोल रहा हूं
कि सवाल केवल
सौ रुपए का नहीं
सवाल
संपूर्ण व्यवस्था का है
जिसके दागदार होने से
यह देश
दागदार हो जाता है
एक कवि
पाकिटमार हो जाता है।
-धीरु

11 comments:

ललित शर्मा said...

बहुत बढिया,शैली पसंद आई,आगे भी लिखे,
आप का स्वागत करते हुए मैं बहुत ही गौरवान्वित हूँ कि आपने ब्लॉग जगत में पदार्पण किया है. आप ब्लॉग जगत को अपने सार्थक लेखन कार्य से आलोकित करेंगे. इसी आशा के साथ आपको बधाई.
ब्लॉग जगत में आपका स्वागत हैं,
http://lalitdotcom.blogspot.com

RAJNISH PARIHAR said...

ब्लॉग परिवार में आपका स्वागत है!लिखते रहें और पढ़ते रहें ...तभी आपका आना सार्थक होगा..

निर्मला कपिला said...

बहुत सुन्दर कविता के माध्यम से आज की व्यस्त्yaथा और कवि की दयनीय स्थिति पर अच्छा कटाक्ष है शुभकामनायें

अजय कुमार said...

waah kya baat hai
swagat ayr shubhkamnayen

शशांक शुक्ला said...

मजेदार लिखा है

गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर said...

narayan narayan

Amit K Sagar said...

चिट्ठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है. लेखन के द्वारा बहुत कुछ सार्थक करें, मेरी शुभकामनाएं.
---

दोस्ती पर उठे हैं कई सवाल- क्या आप किसी के दोस्त नहीं? पधारें- (FWB) [बहस] [उल्टा तीर]

Yugal said...

बहुत अच्छा लेख है। ब्लाग जगत मैं स्वागतम्

डॉ. राधेश्याम शुक्ल said...

kya khoob chitran kiya hai vyavastha ka.

रचना गौड़ ’भारती’ said...

आपकी कविताओं को पढ्ने के लिए किलोमीटर तक स्क्रीन पर चलना पडा
कविताओं मे काफी गहराई व मार है ।
बधाई ।

Meraj Ahmad said...

badhai! bahut khoob!